Wednesday, 13 May 2015

'जरुरत' तो 'फकीरों' की भी 'पूरी' हो जाती है, और 'ख्वाहिशें'..... 'बादशाहों ' की भी "अधूरी" रह जाती है".....



नंगे पाँव चलते "इन्सान" को लगता है
कि "चप्पल होते तो कितना अच्छा होता"
बाद मेँ..........
"साइकिल होती तो कितना अच्छा होता"
उसके बाद में.........
"मोपेड होता तो थकान नही लगती"
बाद में.........
"मोटर साइकिल होती तो बातो-बातो मेँ
रास्ता कट जाता"

फिर ऐसा लगा की.........
"कार होती तो धूप नही लगती"

फिर लगा कि,
"हवाई जहाज होता तो इस ट्रैफिक का झंझट
नही होता"

जब हवाई जहाज में बैठकर नीचे हरे-भरे घास के मैदान
देखता है तो सोचता है,
कि "नंगे पाव घास में चलता तो दिल
को कितनी "तसल्ली" मिलती".....


" जरुरत के मुताबिक "जिंदगी" जिओ - "ख्वाहिश"..... के
मुताबिक नहीं.........

क्योंकि 'जरुरत'
तो 'फकीरों' की भी 'पूरी' हो जाती है, और
'ख्वाहिशें'..... 'बादशाहों ' की भी "अधूरी" रह जाती है".....

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