Wednesday, 13 May 2015

'वक्त' बीत रहा है , "कागज" के "टुकड़े" "कमाने" के लिए........



"जीत" किसके लिए, 'हार' किसके लिए
'ज़िंदगी भर' ये 'तकरार' किसके लिए...

जो भी 'आया' है वो 'जायेगा' एक दिन
फिर ये इतना "अहंकार" किसके लिए... ए बुरे वक़्त !
ज़रा "अदब" से पेश आ !!
"वक़्त" ही कितना लगता है
"वक़्त" बदलने में.........
मिली थी 'जिन्दगी' , किसी के
'काम' आने के लिए.....
पर 'वक्त' बीत रहा है , "कागज" के "टुकड़े" "कमाने" के लिए........

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